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Saturday, December 31, 2011

फिर एक नया साल बनाएं...


आओ कुछ  दिन इक्कठे करें फिर...  फिर एक नया साल बनाएं...

कल के सूरज में नया ढूंढें कुछ.....  फिर रातों में नए दीप जलाएं ... 

बच्चों की हंसी फिर से सुने.... चिड़ियों की आवाजों से नए गीत बनाएं ..

कुछ दोस्त नए इक्कठे करें ....  कुछ नए शेर और सुनाएं .. 

बातें सुने कुछ तुम्हारी.... कुछ अपनी बात बताएँ.... 

नयी बारिशों में भीगें.... गीली मिटटीओं की खुशबु फैलाएं ..

आओ कुछ  दिन इक्कठे करें फिर...  फिर एक नया साल बनाएं...




Friday, December 30, 2011

बहुत ठण्ड थी.. उस रात....


एक पुरानी सड़क है... टूटी सी...  मैं रोज़ उस सड़क से ऑफिस जाता हूँ.... कुछ दूर उस सड़क पर एक चौराहा है... एक छोड़ा गोल चबूतरा है... ठीक उस चौराहे के बीच....


एक सफ़ेद बालों वाली बुढिया (शायद "बुढिया" शब्द भी उसकी उम्र के हिसाब से छोटा हो).. उस चबूतरे पर अपनी पीठ टिकाए एक पोटली में कुछ पुराने कपड़ों के टुकड़े, रोज़ टटोलती है.... चेहरा पूरा झुर्रियों से भरा पड़ा है.. आखें बहुत छोटी हो चुकी थी.. बहुत थकी सी दिखतीं थी.
मैं रोज़ देखता हूँ उसे...  उन कपड़ों के टुकड़ों को टटोलते हुए.. मानो... उसे ये चिंता है.. की कहीं कोई कम तो नहीं....?

प्लास्टिक की एक पुरानी पन्नी में कुछ बासी खाना और पुराने कपड़ो की पोटली... उसके बगल में रोज़ रहती..  अगर कोई ठीक से न देखे... तो चौराहे पर तीन पोटलियाँ नज़र आती.... दो छोटी.. और.. एक काफी बड़ी...

ठंडी का मौसम था... मुझमें कार की खिड़कियाँ खोलने  तक की हिम्मत नहीं थी पर फिर भी उस चौराहे पर अनायास ही आँखें रोज़ उस बुढिया को ढूँढती, बंद खिडकियों के पीछे से..

शायद उसे ठण्ड का एहसास नहीं था. सही बात तो है.. भूख का एहसास, हर एहसास को मार देता है.

मैं शाम को जब ऑफिस से घर लौटता तो वहीँ, उसी जगह पर बैठी मिलती,ठीक उसी जगह.
कई बार मन करता की कार रोक कर, उसे कुछ पैसे दे दूँ. कभी कभी तो जेब तक हाथ भी गया, पर जब तक ब्रेक पर पैर रखता, पीछे वाली गाडी का होर्न जोर से कान में गूँज जाता.

मैं कभी अपनी गाडी रोक नहीं पाया. कभी नीचे उतर नहीं पाया. पर हर बार  इसका कारण वो पीछे वाली गाडी को होर्न नहीं था.

ठण्ड रोज़ बढ़ रही थी. कार के बंद शीशे भी, अब ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे थे.

अब उस बुढिया के हाथ कापते नज़र आ रहे थे. पैरों में फटे मोज़े आ गए थे. एक पतली सी चादर भी थी.
रोज़ की तरह मैं, उसे देखता हुआ निकल जाता.

एक दिन शाम को घर पहुँचने ने के बाद टीवी पर देखा, ठण्ड ने कई सालो का रिकॉर्ड तोड़ दिया था. १८३ लोग मारे जा चुके थे शहर में.

मैंने एक छोटा स्टूल उठा कर पुरानी अलमारी के ऊपर पड़े कपड़ों के ढेर में से एक पुरानी रजाई निकाल ली. थोड़ी फटी थी,पुरानी भी, पर शायद उस बुढिया के लिए काफी थी. टीवी पर उस समाचार पढने वाले को भी नहीं पता होगा की उस की इस खबर का,  किस पर क्या क्या असर हुआ है. मैंने  कार की चावी उस पुरानी रजाई पर रख दी ताकि सुबह जाते वक़्त कहीं रजाई भूल न जाऊं.

उस रात बहुत ठण्ड लगी, मुझे याद है. मैंने दो बार उठ कर देखा था की कोई  खिड़की कहीं खुली तो नहीं रह गयी है. दरवाज़े ठीक से बंद है.

बहुत ठण्ड थी.. उस रात....

सुबह उठा तो ,हाथ पैर सब ठंडे पड चुके थे, किसी तरह ऑफिस जाने के लिए तैयार हुआ. सुबह टीवी पर, वही समाचार पढने वाला था, उसने भी आज मोटा काट पहन रखा था. कल रात ठंड ने पिछले ५० साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया था.  रजाई... कार की डिक्की में डाल कर, मैं ऑफिस के लिए निकल पड़ा.

चौराहे पर पहुँचते ही, नज़रें उस बुढ़िया को ढूढने लगी,पर वह कहीं नज़र नहीं आई.
वो प्लास्टिक की पुरानी पन्नी (खाने वाली), और वो फटे कपड़ो का ढेर वहीँ था.

मैंने दो बार गोल चक्कर लगाये, पर वो कहीं नज़र नहीं आई.

पैर दो बार ब्रेक पर भी गए....पर ..

याद आया .. पिछली रात ठण्ड बहुत पड़ी थी...
उस समाचार पढने वाले ने भी यही कहा   था.......

मैं कभी फिर ... उस चौराहे के रास्ते से ऑफिस नहीं गया....
सच कहूँ तो ... उस दिन के बाद कभी हिम्मत भी नहीं हुई....

और वो समाचार पढने वाला... अब भी रोज़... टीवी पर .. ठंड की बातें करता है.....

रजाई... अब भी... कार की डिक्की में पड़ी  हैं.......

Photo Courtesy:
http://www.alexsohphotography.com/oldlady/oldlady.jpg

Thursday, December 22, 2011

वो रोज़ आता है....


वो रोज़ आता है...
झांकता है ... खिडकियों से... पर्दों में सुराख ढूंढता है...
मेरे चेहरे पे नज़र रहती है उसकी...  वो खूब निशाने लगाता है..
वो रोज़..   आता है...

मैंने कई बार मुह फेरा.. करवट बदलकर..
मैंने चादरें ओढ़ कर खूब उसे भगाया.. 
वो किसी अपने की तरह .. फिर भी मुझे जगाता है..
वो रोज़ आता है..

परिंदों की कुछ आवाजें.. टकराती हैं जब ठंडी मध्हम हवाओं से..
काली रातों की स्लेटों में .. वो लाल स्याही फैलाता है.. 
वो रोज़..  आता है.. 

चेहरे बदल जायेंगे  .. घर बदल जायेंगे ..
खिडकियों पे होंगे परदे नए
वो छप्परों में पड़ी दरारें ढूंढेगा नयी .. टूटी खिडकियों से .. फिर टकटकी लगाएगा..
वो रोज़.. हर रोज़ आएगा..


Sunday, December 18, 2011

हाँ ... मौसम की पहली बरसात थी...



हाँ ... मौसम की पहली बरसात थी...
कुछ दूर साथ चले थे हम....
आपस में कुछ बातें की थी...उन टकराती  उंगलिओं ने  ...
बूंदों ने न जाने... कितने घर बनाये थे.. तुम्हारे हाथों में...
सड़कों पे पानी बहा था.. वक़्त की तरह.....
आसमानों में रंग भर रखा था... काले बादलों ने..
 कुछ गुनगुनाया था तुमने... बिजलियों के संग...

हाँ ... मौसम की पहली बरसात थी...
कुछ दूर साथ चले थे हम....

Thursday, December 15, 2011

फिर दफ्तर निकल जाऊँगा..


रोज़ शाम को घर पहुँचता हूँ .... दरवाज़े के पीछे लगी उन खुठिओं में ... दफ्तर की बेड़ियाँ टांग देता हूँ ...
गला रोज़ की तरह आज भी तंग है... पैरों को वापस  जमी पर रखने का दम .. अब बचा नहीं....
नींद...  शाम से आँखों पर दस्तक दे रही है... हाथों की उन दो उंगलीओं में कलम के  निशान अब भी हैं...
मेजों पर पड़ी उन मुर्दा  फाइलों  की तरह.. मैं भी पड़ा हूँ अपने बिस्तर पर... कुछ सोचता हुआ सो जाऊँगा..
कल उठूँगा सुबह ... बेड़ियाँ उतारूंगा उन खुठिओं से... पहन कर ... फिर दफ्तर निकल जाउंगा...

दरवाज़े पर ताला लगा कर... ख्वाइशों को  घर में  बंद कर... फिर दफ्तर निकल जाऊँगा..

Wednesday, December 14, 2011

Only Three Allowed...


Year 3011, the trees have all vanished, the sky was now covered with a thick blanket of smoke and there was snow everywhere. Oxygen was now being supplied by pipelines to the houses. I got married 8 months back; dad was in govt institute so we got our extra quota of oxygen in the house. He was now not keeping well, was on oxygen supply mask and would talk less; he hadn’t moved out of his bed since weeks, would only move his eyes. I knew it was only a matter of few days.

My wife was pregnant, she was expecting in few weeks. Along with my father’s health I was now also worried about the new Govt rules, only three persons were allowed in a family, if you are already three, you cannot have a child or a fourth family member. Even I was allowed to marry when my mother passed away a year ago.

I had already received a notice when her pregnancy was detected, they had insisted for an abortion, my lawyers are still on it, but they say that I stand a very weak chance.
3011, my Dad, my wife and myself, only three could live. Times have changed they were allowing four a few years ago. Times have changed.  I had even thought of committing suicide, so that at least my child could live, but then it would be difficult for her to live alone with the child.

Today, she was uncomfortable, labour pain had started. I called for the ambulance it would reach in some time. I was confused, scared. The department people will be at the hospital surely, they would not let us have the baby. I called my lawyer, he said he was helpless. I kept gazing at the ceiling thinking.   

The ambulance reached, started honking at the doorstep. The nurse came in and took my wife to the ambulance. I just asked them for few minutes so that I can go tell my DAD that I will be back in some time.
I went to his room, he was still, in very deep sleep perhaps, it was 3 AM. The oxygen supply mask was still there on his nose. He had to be given pure oxygen, doctor had ordered it. I put my hand on his head, caressed his head and kissed on his wrinkled cheek. I would do this daily before going to office. I looked at the wall , the photograph was still there, me sitting on his shoulders, I was five then. My eyes were moist , tears dropped on the bed sheet, it missed his hand by few inches. With one hand still on his head, I moved my hand towards the oxygen valve and closed it slowly.

Sitting inside the ambulance, I went numb, could only hear the faint cries of my wife and the nurse comforting her. I hadn’t spoken a word after I sat in the ambulance.

As soon as we reached the hospital my wife was taken into the operation theatre. The doctor came to me with a form, along with the department people.

“You will have to abort this kid, you cannot have him”

I said,  I will have to call my father and ask him.

They allowed me one phone call.

I came back from the phone booth after few minutes and said.

“.....................................................He is not picking up”

We had a baby boy......... 

Sunday, December 11, 2011

अल्फाजों को मेरे...  डांट कर चुप कराती है...   खामोशी मेरी..... कितना शोर मचाती है..... 
वो इंतज़ार करता रहा...... करता रहा....... मेरी खामोशी..... मेरा जवाब था.....
कल तुम्हारी बातें की थी.. चाँद से .. आज आसमान में...कुछ तारें कम हैं...
सिर्फ मेरे होठों के कुछ अलफ़ाज़ देखे .... मेरी आखों की दास्ताने... न पढ़ी उसने....
वो खिलोने बेचने वाला.. खिडकियों से झांकती...  बच्चों ख्वाहिशें ढूंढता है...
ये सूखी पत्तियाँ रोज़ आती हैं दरवाज़े पर... शाम को..... तुम्हारा पता पूछतीं हैं....
सुबह टुकड़े मिले ... तकिये के नीचे... ख्वाब थे कुछ... जो रातों में टूटे थे ...
अपनी तनहाइ से इस कदर प्यार है हमे.... धड़कने ज़रा  तेज़ हो.... तो दिल घबराता है....
घर के बाहर , वो पुराना पेड़ बरगद का....  वक़्त को रोके अब तक खडा है....
मोबाइल के बटनों को दबा दबा कर.....  न जाने कितने रिश्तों की साँसे रोक चुकें हैं....,,
माँ.. धुआँ अब भी आँखों में लगता है... इस टूटे चूल्हे पर नज़र पड़ती है जब भी..
माँ तेरे बुने..... उस लाल स्वेटर में.... तेरे कुछ अधूरे ख्वाब नज़र आतें हैं....
आइना लगातें हैं जो अपने घरों में.... अक्सर.. खुद को नज़र नहीं आते...
ज़िन्दगी..... तू जो न मिली होती..... तो मर गए होते.... 
वही शक्श बैठा है  खामोश महफ़िल में....... जो दास्ताने सारी लिए बैठा है.....

Monday, December 5, 2011

Twitter par tweet kar kar ke karna kya hai...


Twitter par tweet kar kar  ke .. karna kya hai....
Yehi jeena hai doston to marna kya hai...

Followers ki ginti ka hisaab....  roz kartein hain..
maa ko par roz... ek phone karne se dartein hain..

Unfollow hone ki chinta....  har pal sataati hai...
purane doston ki call lekin .. humesha miss ho jaati hai..

mentions baar baar check karne ki...  aadat si ho gayi hai....
bachhon se roz  hone waali masti  ..  jaane kahaan kho gayi hai..


Roz naye naye  hashtag banaatein hain....
Office chaahe.. late ho jaatein hain..


Blog par  likhtein hain... roz kuch naya naya .....
biwi ki puraani khwaaishein .. ab tak baaki hai..

faltu si har  tweet retweet kar detein hain...
par padosi ko dekh ke .. duur se hi hass detein hain..

TL ki raftaar roz badhi si  jaati hai......
Zindagi ki ruk si gayi hai  ... ye chinta nahin sataati hai...

Doston..

Twitter par tweet kar ke .. karna kya hai...
Yahi jeena hai doston ko marna kya hai...




inspired by : Lage raho Munnabhai...

Thursday, December 1, 2011

Shahrukh Khan

(Based on True Incidents and Characters)

Take this talk to him, talk to him please. I had no idea why she was behaving this way suddenly and why I needed to talk on the phone and with whom? Talk to him, as the tears rolled down her eyes. I had seen her cry in movies, sitting by my side holding my hand. I always used to carry a neat handkerchief whenever i went to movies with her, i knew her, I knew her tears. My handkerchiefs were a mess, but were clean white, crisp, folded neatly and unused, when I was with her in movies, always. I took care always but I didn’t have a clean one today, as we were not in a theatre watching a movie. But then I had to stop the tears. I had to....

With no idea in the world, I took the phone. SHAHRUKH KHAN... a kid’s voice almost sobbing, SHAHRUKH KHAN.... SHAHRUKH KHAN.... now he was almost crying... I stood there frozen. I had no idea why there was a kid sobbing at the other end of the phone, sobbing saying SHAHRUKH KHAN again and again.

SHAHRUKH KHAN... he repeated almost tenth time. Hello... h h h ee lllo.... I was not a good mimic, but I thought I could do a decent job for a kid. I didn’t know why I was doing this, but I said hello like the bollywood actor does in films. The kid at the other end came to life. SHAHRUKH ITS YOU ?? I said yes it’s me.... it’s me Shahrukh khan... who are you.....? Now I wanted this conversation to happen, I saw her sitting beside me, looking at me, still wiping the tears as i mimicked shahrukh. Though I was talking to the kid on the phone my eyes were still questioning her. They must have asked about 1000 questions to her and she didn’t say a word but the kid on the phone was answering all my questions now. I am Krunal he said. Oh Krunal, so how are you? Do you watch my movies, yes yes he said. I have seen them all, I want to meet you. Hey Krunal, cannot meet you, I am quite busy you know.

But we can talk, tell me about you, your school, your friends. My God !! I was doing a hell of a job as Shahrukh, perhaps the stage thing I did in college was coming out of hibernation inside me. The kid was not answering any of my questions, he had his own, I answered them all, and when i realised his questions weren’t ending, I told him I will call him back later, I had to go for shooting. He didn’t agree at first but then I promised to call him back and I said bye, as Shahrukh says in his movies. bbb bb yyyeee kkkkkk Krrrunaalll, he liked the kkkk rrruuu naalll part very much and laughed but the girl sitting beside me was still wiping her tears, damn the handkerchief. If only I had carried a clean one.

As I disconnected the phone, she started speaking as if she had all the reasons in the world, why this kid on the phone wanted to speak to shahrukh khan.

Was i ok ?? The out of hibernation actor in me asked, asked before she could explain anything.

Yes you were, you were perfect. I knew you could do this. That’s why I chose u didn’t I ? Then she told me, he was a boy, a small boy 8 yrs old, had severe autistic problems, had occasional fits and his conditions was deteriorating day by day. But one thing he was very close to his teacher, the girl I was standing right next to. The girl, who still had her eyes moist.

His favourite hero was Shahrukh khan and occasionally during those fits, he would repeat Shahrukh khan I want to meet shahrukh khan and one fine day, she promised that if he behaves well, she will make him speak to Shahrukh khan. And thus all happened. I seemed to have impressed him, he really thought that he was speaking to Shahrukh.

The Shahrukh talked once or twice in a week and his voice was getting better and better,but the kid on the other side wasn’t. It seemed his condition was getting worse day by day. The “hellos” on the phone got a little softer and the questions fewer. But still Shahrukh had to talk, every time me and her met, Shahrukh spoke and trust me it was like a stage performance for me doing it before her.

I was now quite attached to the kid, the same way she was attached, I asked a lot about him. It seemed his training was going on well with her but he wasn’t doing that good, he would now cough between our conversations, would go mum, I had to now coax him into talking. I asked questions, but they all weren’t answered. Still his love for Shahrukh was there, the happiness in his voice that he was speaking to Shahrukh was always there, it never faded. It was the same when we first talked, and the best gift I got, while talking to him was the smile on her face, the way she kept looking at me, when I talked.

Then one day, she called, she wasn’t sounding good. Something had happened it seemed. One word she told me and it would like paragraphs for me, one word and I would know everything she had in mind. Even if she didn’t say anything I would read her eyes.

I knew, Krunal was not ok, there was something wrong. She told me he was now in serious condition and she wanted to see him. I picked her up from her home. On way to the hospital, a fifteen minutes drive, tears were rolling down her eyes. But she was not crying, but she was tough she was courageous.

We reached; she straight away got down and was on her way up. She knew me, she knew that I wouldn’t have the courage to face him, to see him. I was the weaker one at heart amongst us. I understood her silence and her way of exit. I parked the car and sat on a bench just outside the hospital gate. She knew how I weak I was, she knew me.

Thinking what would be going on up there, how was the kid, what would his condition be and would she be able to control her tears in front of him. She was his teacher after all. Teachers never cry before their students, never. I knew she wouldn’t. I kept waiting, kept thinking.

After ten minutes I could hear someone running down the stairs. The steps were fast, loud perhaps because of the silence in the hospital. The bench was close to the hospital gate, she looked at me, waved her hand, gesturing me to come inside. She didn’t look in my eyes, she just gestured. I got up fast and when I was just about to reach near her, she started running back towards the room. I held her hand stopped her and asked, what happened? Why are you running? She stopped, I looked in her eyes. We don’t have time, he doesn’t have time, he is sinking, he is almost unconscious, but he was mumbling shahrukh khan, that’s the only thing he is saying now, I want you to see him, do something. She said all this in one single breadth. I was silent now, what I should do, what I can do, I cannot face the child. Over the phone it was ok, but facing him? You know, I can’t, I just can’t, i am not as strong as you are, I am not...

Just be there, just come, she said with a stern voice, like a teacher. We reached the room, there were people standing outside the room, perhaps, relatives, hoards of them. He was there, on the bed, unconscious. His mother was sitting beside him, she was not crying, she was prepared, perhaps she had accepted what was coming. No one in the room knew me, besides her, no one…

I went near to the bed, she held my hand, held it very tightly. She knew how weak I was, she knew I could break down at any moment. She was the one who cried in movies, but she knew, how weak I was, how soft I was. She would always stare at me at traffic signals, when people used to knock at our car window to ask for money and when subconsciously my hand went to my pocket, she would hold it and say, you melt down so easily, you are too soft. I would listen to her as I knew she was correct.

But I really didn’t know how to handle this, there he was lying down. I had never met him before, never seen him before. But I was supposed to be his hero, Shahrukh the hero I was.

I stood beside his bed, his hand was still, with a needle inserted inside a small vein, and it was still, life less but the fingers still moving now and then. I felt her pinching me, she was still holding my hand standing just behind me, I looked at her, looked into her eyes. I understood, I moved my hand closer towards his, I touched his hand and as I touched his hand. I saw his eyes open. He looked here and there, looking for the one who was touching his hand and then he found me. He looked in my eyes, kept looking, I didn’t know what to say, what to do. I pressed her hand, she pressed mine. I again looked into his eyes, then his lips tried to move, tried to say something. I bent over, held my ear close to his mouth, to hear what he wanted to say, I kept waiting, to understand what he was trying to say, to hear what he was trying to say. I kept waiting, with her holding my other hand. I heard some voice, I put my ear closer to his mouth and I heard "Shahrukh Khan….. Shahrukh khan" then he was silent… silent forever. The Shahrukh stood there, looking at his closed eyes, the Shahrukh he created, the Shahrukh he wanted to meet, tears rolled down my eyes.

I looked back towards her. She was not there, the Shahrukh stood there alone, wondering, how he recognized me.

Years after.. I still wonder….


Wednesday, November 30, 2011

बचे हुए सिक्के . गुल्लक में डाल देतें हैं......
गरीबों के घरों में... हिसाब नहीं होते..
नेता ज़माने में.... बदनाम हैं इस कदर....
गांधी कौन था... बच्चों को समझाऊं किस तरह...
में नींदों का सौदा अभी कर के लौटा हूँ...
रातों से कहे कोई.... हालात काबू में हैं....
दोस्तों से दोस्ती कर के.. कुछ न मिला..
अब दुश्मनों से.. थोड़ी दुश्मनी की जाए ...
बारिश में भीगने का... उसे डर नहीं है अब तक...
आसमान से ज्यादा.... छत टपकती है घर की...
रोज़ दिन पूरा हो जाता है .....
कुछ कहानियां अधूरी छोड़ कर...
माँ ने कुछ रूपए..... आटे के डिब्बे में छुपाये थे....
ख्वाब कुछ ऐसे ..... मेरे पकाए थे....

वो रोज़ नया बहाना कर के घर लौटता है...

बच्चों की पुरानी जिदें टालने के लिए...

Tuesday, November 29, 2011

बचपनों की लाशें... दिखती है इन बस्तियों में...
फिरती हैं ज़रूरतें यहाँ ...कातिलों  की तरह....

जिनसे खेलने की उम्र है उसकी..... 
वो उन खिलोनो को.. सड़क पर बेचता है....
नंगे ज़मीरों वाले भी आजकल  ...
सर पर गांधी टोपी  पहनते हैं...
यह सितम नहीं तो और क्या है.... 
वो सपने में भी आता है.... तो नींदें  उड़ाने को....
बिकतें  हैं यहाँ .....न जाने क्या क्या सामान ...
हमने ज़मीर तक .. तराज़ू पर देखे.. इन दफ्तरों में... 
तेरे ज़ुल्म की तुझे..... यूं सज़ा मिले.....
 मुझसे जो तुने की थी.... तुझे वो वफ़ा मिले....

घर जलाया .....  उन चिरागों ने.... 

जो कहते थे..... की रौशनी होगी.....

वो पत्थर था इसलिए ... जिंदा है अब भी... 
जो आइना होता तो कब का... बिखर गया होता.... 
हवाओं के साथ साज़िश कर .....
चिरागों ने न जाने घर कितने जलाए....

कुछ कहानियां कहीं थी तुम्हारी उँगलियों ने... मेरे हाथों  से..... 

इन लकीरों में .... .. ढूंढता हूँ तुम्हे.. अब भी अक्सर...

Thursday, November 24, 2011

भगत सिंह.....


मार्च २३ १९३१ ... करीब... अस्सी साल बीत गए थे... वो लाहोर जेल के बाहर आज फिर खडा था... अब भी उसे वो दिन याद था... बहुत भीड़ थी जेल के बाहर.... दो और साथी भी थे उसके... फाँसी पर हँसते हँसते चढ़ा था वह.. वही हंसी आज भी उसके चेहरे पर थी.. देश आज़ाद जो हो चुका था... अस्सी साल बीत गए थे ... बहुत आगे बढ़ गया होगा देश... बहुत कुछ बदल गया होगा...

आखिर जान दी थी उसने... जान..

वह इधर उधर देखने लगा... रात बहोत हो चुकी थी... कोई नज़र नहीं आ रहा था... वह आगे की तरफ बढ़ गया... दूर एक दीवार से सटी खुर्सी पर एक बूढा चौकीदार सो रहा था.... वह चौकीदार के पास पहुंचा .. अपना हाथ उसके कंधो पर रखा और .. धीरे से उसे उठाया... "भाई साहब... भाई साहब....."

नीद कच्ची थी.. चौकीदार ने चेहरा उठा कर उसके चेहरे की तरफ देखा... कुछ जाना पहचाना सा चेहरा लगा... पर याद नहीं था .. किसका.. जाना पहचाना तो था....

"हाँ भाई... इतनी रात अकेले घूम रहे हो... क्या चाहिए" चौकी दार ने चेहरा याद करने की कोशिश करते हुए.. उस से पुछा


"सब कैसा चल रहा है.. सब कुछ ठीक है ना देश में..हम आज़ाद हैं न अब "

सवाल ही कुछ ऐसा था .. की चौकीदार को याद आ गया.. की चेहरा किसका था...

"आप भगत सिंह हैं ना... भगत सिंह.... "

वोह हल्का सा मुस्कुराया... "हाँ...भगत सिंह ही हूँ.. सब ठीक है ना देश में " ....... उसने फिर से चौकीदार से पुछा..

"हाँ सब ठीक है मुल्क में.. पर यह आपका मुल्क नहीं है आप लाहोर में हैं "
"यह पाकिस्तान हैं जनाब.. पाकिस्तान ...., आप हिंदुस्तान जाइए.. दिल्ली जाइए..."

वोह घबरा गया... "पकिस्तान ?? हिन्दुस्तान ??

" हाँ बेटा अब तो चौंसठ साल हो गए" चौकीदार ने उसकी आखों में देखते हुए कहा...

वोह मुड कर वापस अँधेरे की तरफ जाने लगा... हलके हलके कदमों से... वापस मुड कर नहीं देखा... बस चला जा रहा था ... धीरे धीरे...

चेहरे पर हंसी नहीं थी अब... आखें भीग आयीं थी .... वोह इतना कमज़ोर नहीं था.. फाँसी पर भी हँसते हँसते चढ़ा था वह ...... पर आज आखें भीग आयीं थी..


जान दी थी उसने.... जान.....






Saturday, November 19, 2011


बूंदे जो गिरी बारिश की यूं..... कुछ ख्याल भीग गए.....

चार कदम भी चल न पाया वो मुड कर...
जो मुझसे... फांसले चाहता था....

उस पेड़ की हर पत्ते पर एक कहानी लिखी है....
जिसके तने को साथ हमने छुआ था कभी....

वो टूटी छत्री आज भी कोने में पड़ी है.......
जब भी नज़र पड़ती है.... भीग जाता हूँ....

Friday, November 18, 2011

Billionaire...

he was standing on the balcony of his plush bunglow .. looking at the labourers sleeping on footpath just opposite to his bunglow... it was 12 am.. he was not able to sleep..

he went back again to his room.. took a sleeping pill and tried to sleep again... could not sleep.. went to the balcony again.. looked at those sleeping labourers.. sat there in the balcony for about an hour .. sleepless... restless... didn't know what to do.....

went back to the room... took two sleeping pills this time... tried to sleep... but couldn't.... again went to the balcony... it was 4:00 am.... the labourers were still sleeping... on the footpath...

the billionaire.. was awake...



इश्तिहारों में कहीं दब गयीं हैं खबरें .....
हालातों की किसी को कुछ खबर नहीं...

वह नींद की गोलियां खरीदता है बाजारों से.. ..
जो फुटपाथ पर सोये हुए मजदूरों पर रहम खाता है....

Thursday, November 17, 2011

लाल मारुती ...

बहुत गुस्से वाला था वह ... पिताजी हमेशा समझाते रहते की.. बेटा इतना गुस्सा ठीक नहीं हैं .. थोडा दीमाग ठंडा रखा कर.. काफी दिनों से वह मोटर साइकिल की जिद कर रहा था .. पिताजी एक मामूली सी ऑफिस में क्लेर्क की नौकरी करते थे... इसलिए थोडा मुश्किल था.. वह रोज़ आकर पिता से बहस करता.. पिताजी की तबियत ठीक नहीं रहती थी इसलिए ज्यादा नहीं बोल पाते थे..

फिर एक दिन वह शाम को कॉलेज से घर लौटा, कोई दोस्त उससे अपनी मोटर साइकिल पर घर तक छोड़ने आया था. "देखा पिताजी... मेरे हर एक दोस्त के पास मोटर साइकिल है" आज बहुत गुस्से में था वह . खाना भी नहीं खाया..... माँ ने बहुत पूछा, पर किसी की कहाँ सुनने वाला था वह... बहुत गुस्सेवाला था.

देर शाम.. माँ ने चुपके से पिताजी के पास आकर कहा, " कब तक टालते रहोगे ?" कितने महीनों से जिद कर रहा है , ला दो ना इसे मोटर साइकिल" .

पिता ने कुछ कहा नहीं , बस मुड कर एक बार माँ की आँखों में देखा , बस फिर आगे कुछ बात नहीं हुई. कुछ बातें शायद कहीं नहीं जाती सिर्फ समझ ली जाती हैं ..

पिता रात भर सोचते सोचते सो गया , रोज़ की तरह फिर सीने में हल्का हल्का दर्द था.

अगले दिन ऑफिस जाकर उसने लोन के बारे पता किया , पत्नी की आँखों में उसने बहुत कुछ देखा था कल. शाम तक लोन के कागज़ भर दिए, अगले दिन उससे पुरे लोन के पैसे मिलने वाले थे.

वह शाम को घर पहुंचा , पत्नी को बताया की इंतज़ाम हो गया है लोन का... और कल वोह मोटर साइकिल ले आएगा . बेटा घर आया , आज भी गुस्से में था , खाना जल्दी खा कर सो गया था.

पत्नी कुछ घबराई हुई आज , पिता ने ठीक से खाना नहीं खाया था आज, "लोन में तकलीफ तो नहीं होगी ना". पिता ने करवट बदली और पीठ पत्नी की तरफ करते हुए कहा " नहीं , कोई तकलीफ नहीं होगी ". फिर कोई बात नहीं हुई.....

अगले दिन शाम को मोटर साइकिल घर पर थी, माँ दुप्पटे से सीट पोंछती हुई मोटर साइकिल को निहार रही थी... शाम होने वाली थी, बस बेटा घर पहुँचता ही होगा.. पिता के चेहरे पर कुछ भाव नहीं थे. .. आज कुछ ठीक नहीं लग रहा था उसे .. वह खुर्सी पर बैठा हुआ था.. शांत था .. बेटा घर लौटा , और मोटर साइकिल देखते ही ख़ुशी से पागल हो गया .. ना पिता की तरफ देखा ना माँ की तरफ.. सीधा मोटर साइकिल पर बैठ गया.. "अभी पप्पू को दिखा कर आता हूँ ... " उसने मोटर साइकिल शुरू की और घर से बहार निकल गया " ..

माँ बाप अब तक एक दुसरे का देख रहे थे.. माँ ने हल्की सी मुस्कराहट के साथ कहा "बहुत खुश है .."

वह मोटर साइकिल को तेज़ी से चलाता हुआ घर से काफी दूर निकल चूका था... तभी सामने से एक लाल रंग की मारुती वेन उससे टकराते टकराते बची... उस से कुछ दूर ही ब्रेक लगा कर रुकी.. उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया , उसने गाडी साइड में लगाई और सीधा उस मारुती वेन के ड्राईवर का गिरेबान पकड़ कर बाहर निकाला .. बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता था उसे..

जब तक पूरा गुस्सा नहीं उतरा उसने उस लाल मारुती के ड्राईवर को छोड़ा नहीं , करीब आधे घंटे की गाली गलोच और हाथापाई के बाद ही थोड़ी शान्ति हुई.. और फिर वह पप्पू के घर की और निकल गया..

शाम को जब वापस लौटा तो देखा की घर पर बहुत भीड़ लगी थी.. वो समझ नहीं पाया की हुआ क्या है... घर के बहार ही मोटर साइकिल लगाई और घर में चला गया.. पिताजी दम तोड़ चुके थे.... माँ कहीं नज़र नहीं आ रहीं थी... औरतों ने उन्हें घेर रखा था...

किसी ने उससे बताया की .. दिल का दौरा पड़ा था पिताजी को... किसी ने शहर से गाडी भी मंगाई थी फ़ोन कर के....पर गाडी पहुँचने से पहले ही... .. पिताजी दम तोड़ चुके थे....

लाल रंग की मारुती वेन थी.... समय पर नहीं पहुंची...

वह आजकल शांत शांत ही रहता है... मोटर साइकिल भी अक्सर घर पर ही खडी रहती है.....


मौत मांगू खुदा तो मौत भी न मिले... बेरुखी भी तेरी.. जानलेवा है..

Wednesday, November 16, 2011

Badtameez... Fauji.....

"Bhai Saab... Zara akhbaar denge...
Ek thakaa sa fauji, raat ke kuch gyaarah baje..
train ke dibbae mein soye hue ek yaatri ko utthane ki koshish kar raha thha..
"Bhai saab... Bhai saab .. zara akhbaar denge..."

Woh yatri uthh kar apni seat par baith gaya... aakehin malta hua bola "kya hai bhai...??"
Fauji apni wardi mein hi thha.. ... uski chutti cancel hui thhi..
Duty pe wapas turant bulaaya thha, reservation milna to namumkin thha,
isliye woh general tiket lekar seedha chhadh gaya thha train mein..

"Bhai saab.. woh akhbaar denge zara.. mein yahaan neeche bichha ke so jaaungaa..."
Fauji halki si aawaz mein bola..
"Arrey bhai saab kyaa baat kar rahein hai .. yahaan ladies so raheein hain .. aap kaise so saktein hain yahaan par"..
woh yaatri zor se chillaayaa..
Fauji ko bhi thoda gussa aayaa... "sirf 4-5 ghante ki baat hai bhai saab... who bhi thoda sa zor se bolaa.."


Baat kaafi badh gayi... aas paas ke log bhi uth gaye...
Hathaapaai.... hui.. Fauji akelaa thha, thaka hua thaa isliye..
jyada kuch kar naa saka... kuch college ke ladkon ne... khoob haath pair chalaaye..
Agle station par police aayi, fauji to train se neeche utaar diya gaya..
kuch chote mote akhbaar ke reporters bhi aaye.. agle din kuch akhbaaron mein khabar bhi aayi..
yaatri ka naam, station ka naam... humgaame ka pura vivaran thha...

par fauji ka naam nahin thha...

Fauji apne base to paunch gaya thha... na jaane kaise pahunchaa hoga.. par pahunchaa thha...
Aate hi turant usse.. ek operation par bhej diyaa gayaa..
ek goli seedha sar par lagi... aur woh shaheed ho gayaa..
Agle din akhbaar mein khabar aayi.... "
aatankwaadion se muthbhed mein ... 6 aatankwaadi maare gaye aur sena ka ek jawaan shaheed hua"
.. ghatna ka pura vivaran thha... jagah ka naam thha... yahaan tak ki aatankwaadi sangathan ka naam bhi thha... par .... iss baar bhi...

fauji ka naam nahin thha..

Kaafi saal beet chukein hain, aaj bhi fauji ke gharwaale sochtein hain....
ki sar par goli ke ghaav ke alaawaa... uss ke haath aur pairon par jo choton ke nishaan thhe ... woh kaise aaye...

aur aaj bhi......woh log, jo uss train ke dibbe mein thhe uss din..
apne doston ko ,uss badtameez fauzi ki kahaani, badi chaav se sunaate hain...

Tuesday, November 15, 2011

Jaane do na saab....


aaj office se aadhe din ki chhuti li thhi..
woh kisi rally mein bhaag lene ke liye jaa raha thha...
Bhrastachar ke khilaaf ...suna thha ki bade bade log wahaan roz aatein hain.. aur bhaashan detein hain..
Bhookh hadtaal par bhi baithaa hai koi.... TV mein dekha thha usne... ab usse khud wahaan jaa kar dekhnaa thha.. ek ajeeb saa mahol thha desh mein.. maano aazaadi ki duusri jang ho...

Dada ji ki puraani topi almaari si nikaali.. aur ... ek chota tiranga lekar ghar se nikal gayaa....
wahaan pahuncha to dekha ki bahut bheed thhi ... motorcycle khade karne tak ki jagah kahin dikh nahin rahi thhi... usne pure maidaan ke do chakkar lagaye.. tab jaa kar ek gate ke paas kuch motorcyclein rakhi hui dekhi.. usne turrant motorcycle ka handle ghumaaya aur motorcycle wahaan laga di...

Gaadi stand par lagayi hi thhi ki.. ek hawaldaar seeteee bajaata hua aaya... "arrey hataao gaadi.. yeh "no parking" hai.. hataao..!! "..

"arrey saab jaane do naa.. kitni gaadiyaan khadi hain yahaan pe"...
hawaldaar bolaa "nahin aap aise nahin laga sakte motorcycle yahaan pe.."

"Arrey saab jaane do naa.. mein aadhe ghante mein wapas aa jaunga..."
"Arrey samajhate nahin kya.. aise nahin park kar sakte"

Usne turant ... jeb mein haath daala... pachaas rupaye ka ek note nikaala...
hawaldaar ke haat mein thamaaya.. aur jhandaa lekar... ek do teen chaar , khatam karenge bhrastaachar chillaane waalon ki bheed mein shaamil ho gayaa....

haan aur usne topi bhi pehni thhi....

Hawaldaar khush thha... woh pachaas rupay ka note jeb mein rakh hi raha thhaa...

ki ek aur motor cycle aayi....

woh phir se seetee bajaane lagaa....


Har ek ke paas.... na jaane kitni kahaaniyaan thhi...
Samaan jo ghar se nikle... sab afsaane le gaye....

Monday, November 14, 2011

Aakhri Bus

Aakhri Bus

Woh roz.. usi paan ke dukaan par aataa thha... shaam ko der raat cigarette peene...
Aaj bhi usi dukaan ke paas bane chabutare par baith kar woh... muh se dhuaan udaate hue.. guzre hue din ke baare mein soch raha thha... aaj tankhwa aai thhi.. pehli tarikh thhi.. shayad kharchon ke baarein mein soch raha thha..

Ek ladka, 20-22 saal ke lagbhag ka ..paas aakar 25 rs maangne laga.. hairan ho kar usne puchaa.. 25 rs ..?? abe itne paise koi maangta hai kya kabhi.. tu to theek thaak ghar ka lagta hai.. itni raat mein bheek maang raha hai....

saab, mein iss busstop pe bahut der se khada hun.. aur kisi ne ye bola hai ki.. ab bus nahin aaeygi. aakhri bus thhi saab... woh riksha walaa 50 rs maang raha hai... mere paas sirf 25 hi hain... Chaal be, tere jaise roz aatein hain... saale naya tarika hai bheekh maangne kaa.. woh cigarette ka dhuaan muh se baahar nikaalta hua gusse se bola...

Saab, mein kal isi jagah aapko lauta dunga... mein jhooth nahin bol raha hun.. raat hai isliye rikshaw waala advance maang raha hai.. nahin to mein usse ghar jaa kar de deta... please saab.. thodi help kijiye naa..
chal be.. bhaag.. kuch nahin milegaa.. usne cig ko pair ke neeche dabaate hue.. zor se kaha, aur sadak paar karta hua apne ghar ki taraf.. jaane laga... tabhi kuch zor se aawaj hui....

aakh khuli to apne to aspataal mein pada hua payaa usne.... chot jyada to nahin lagi thhi.. takkar lag gayi thhi kisi gaadi se.. thodi si kharonchein thhi haathon mein aur maathe pe thodi soojan thhi... shayaad takkar ki wajah se behosh ho gaya thha woh.... tabhi achanak khayal aayaa.. hath mein ghadi dekhi .. gale mein sone ki chain dekhi.. sab thha.. par.. purse??? purse gayab thha... usne apni sabhi jebon mein dekha.... par purse nahin thha.. pure mahine ki tankhwa thhi usme..

Saala woh ladka.. le gaya lagtaa hai... pure.. 8000 rupay thhe usme.. maje ho gaye saale ke...

Tabhi nurse daudti hui andar aayi.. bola aap late jaaiye... aapko abhi aur aaram ki zarurat hai.. kuch reports aani baaki hai..

Nurse.. Mera purse .. mera purse gayab hai.. kaafi paise pade thhe usme.. Nurse haste hue boli.. arrey haan... woh mere paas hai... ek ladka kal tumhe yahan le kar aaya thha.... usne yeh mujhe diya thha sambhalne ke liye... nurse ne purse usse haathon mein dete hue kaha...

Usne jhat se woh purse liyaa aur paise gin ne laga.... pure paise gin ne ke baad... woh khaamosh sa ho gaya... aankhein bheeg aayi uski....
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purse mein 25 rs ... kum thhe....


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Woh itna hi jaanta thha ki purse mein sirf 25 rs kum thhe.. par woh yeh nahin .. jaantaa thha ki.. jis bus se pichli raat takkar hui thhi... woh uss raat ki aakhri bus thi...

Sunday, November 13, 2011


Laqeerein

Beta bada utsuk thha... apne haat ki laqeeron ko dekh kar kuch soch raha thha..
khelte khelte achanak hi nazar pad gayi thhi apne haathon par... daudta hua ghar ke andar gaya...

akhbaar padh rahe pitaa ke paas jaa kar dono haath dikhaate hue bola... papa yeh kya hai.... pita halka sa muskuraaya... bola "Beta yeh tumhaare haath hain..."

"Arrey papa nahin yeh, inn haathon mein kya hai"

Pita phir hasaa aur usse god mein le liya.. uske dono nanhe haath apne haathon mein liye.. aur apne chehre ke paas le gaya... "Beta yeh laqeeren hain... jitni jyaada laqeeren utnaa hi mein tumse pyaar kartaa hun"...

Beta bahut khush hua... ek ek laqeer ko dikhaane laga apne pita ko.. "Papa idhar dekho, idhar bhi, arrey yahaan bhi hai!" kitni saari laqeeren hain... " Aap mujhse kitna pyaar kartein hain naa."

Bahut khush thha baap, ki apne bete ko itni achhi tarah se samjhaa payaa...
Beta apne haathon ki taraf dekhte hue.. daudta hua bahar chalaa gaya...
Shaayad , apne doston ko bataane gaya thha...

Yahaan ghar mein bhaitha pita.. ab bhi khush ho raha thha .. pyaar kya hai .. bahut achhi tarah se samjhaaya usne apne bete ko... Woh anadar hi andar khud par garv kar raha thha ki...
beta phir ghar ke andar daudta hua aayaa ....pita ke saamne khada hogaya ...

aur haafte hue kaha....

"Papa daadi ke haathon par bhi laqeerein thhi.. aur unke to chehre par bhi... kitni saari laqeeren thhi...
phir woh... humaare saath kyon nahin rehti... akeli kyon rehti hain...." ??


na jaane kitni kahaaniyaan bani hongi aaaj.....
na jaane kitne ... ghar der se laute honge....


bacche na hindu.. na muslmaa hotein hain...
schoolon tak kahaan... aaawaz pahunchti hai mandiron aur masjidon ki.

kuch sochta sochta... so gaya woh raat mein....
din ne shaayad... bahut badsaluki ki thhi uss se....


bacche na jaane aaj kal.. ghar mein baithe baithe... video game ke record todte rehtein hain ....
hum to pedon se aam.... aur khidkiyon ke sheeshe toda karte thhe...

dhuul lage bartan ... roz koi nai kahaani pakaatein hain rasoi mein....
woh der se aataa hai raat mein aur... bhuka so jaataa hai...

Woh tumhaari Galti thhi... Aur Mera pyaar....

Saturday, November 12, 2011

film nayi thhi.. logon ko pasand bhi aayi... khoob shor machaaya logon ne har gaane par...
Bacche ko god mein lekar baithi ek maa.... usse chup karaane ki koshish kar rahi thhi...
bahut hilaayaa.. sahlaayaa... par woh so nahin rahaa thha. shor bahut thha....

film nayi jo thhi...

maa bacche ko god mein lekar seat se uthi... aur .. use sehlaate hue.. hall ke baahar aayi...
shor kam thha... woh bacche ko apne haathon mein hilaate hue idar udhar ghoomti rahi...

ussi cinema hall ke baahar...ek kamzor saa admi.. maiele kuchele phate kapde pehne hue..
cycle le kar khadaa thha...
cycle ki aage waali seat par..ek chota sa bachha handle par sar rakh kar sone ka natak kar raha thha.. jee haan natak...

woh aadmi bheed mein idhar uhar cycle le jaakar bacche ki taraf ishaara karta hua haat failaa raha thha...
kuch paise mil jaay usse ..... to shayaad uss bachhe ko sone ka natak naa karna pade..


kuch bacchon ko sulaane ke liye.... bheed se nikaalna padta hai.... aur....
kuch ko bheed mein daalna..................

Hidaayatein dijiye... to hidaayaton ki tarah...
Na mein khada hun aapki chokhat pe.. na aapne dukaan khol rakhi hai..

Sher likhna chaahun... to roz likhun mein....
par kuch din mere... acche bhi guzar tein hain aksar..
Inton se.. ret ke dher pe raaste banaakar khush ho jaate hain..
Bachhe... mazduron ke.. khilone nahin maangte...
kuch saamaan... ghar se... aaj nikaal liye gaye....
yaadon se bharaa pada hai aaj ghar...

waqt lagta hai unhe.. bharne mein...
jakhm jo nazar nahin aate....
Istihaaron mein kahin dab gayi hain khabrein...
Haalaaton ka aaj... kisi ko pata nahin....

Friday, November 11, 2011

Woh ek puraani si sadak ke kinaare... apne dono ghutne muh tak samet kar baitha thha.. budhaa sa lag raha thha...

baal safed .. badhi dhaadi... aur adh khuli jhurriyon waali aakein.. thandi ka mausum thha... tan pe kuch kapde to thhe.. par shaayad kaafi nahin thhe.. thithur raha thha ab bhi woh... do din se bhookha thha.. isliye.. thandi ki fikr nahin thhi usse..

bass aane jaane waali gaadion par nazar thhi.. ki kahin kisi gaadi se koi.. kuch khaana fenkh de... haa fenkh hi de.. woh uun hin pada raha.. gaadion ko dekhte hue.. shaayad itni bhi taqat nahin bachi thhi usme ke hil sake... bas palkein hi jhapak raha thha woh..

Ek hawaldaar tabhi sadak ke dussre aur aa kar khada ho gaya... roz to aisa nahin hota thha... pas koi bandobast hoga shaayad.. neta koi aane waala hoga shaayad...

Tabhi.. ek badi si gaadi uss hawal daar ke paas aakar ruki... koi raasta puch rahaa thha... ek chhote bacche ne apne chhote se haantho ko gaadi se bahar nikaalaa aur kuch sadak ke kinaare phenk diya.. Gaadi aage nikal gayi... Uss budhe ki nazar padd chuki thhi uss khaane par...

Usne ungalian hilai pairon ki... aur gutne chehre se duur kiye... kareeb dus minute tak usne bahut koshih ki.. dheere dheere khada hua ... pair ladkhada rahe the... taqat zaraa bhi nahi thii.. par... iss se pehle ki koi .. jaanwar uss khaane tak pahunche.. usse uss phenke hue khaane tak pahunchnaa thha...

woh hilte dulte.. ladkhadaate hue... sadak paar karne lagaa... tabhi hawaldar ki nazar uss par padi... gusse se hawaldaar ka chehraa tamtamaa gayaa... woh daudta hua .. uss ladkhadaate hue budhe ke paas aaya.. danda ghumaa ke budhhe ko sadak par hi giraa diyaa..

aur gusse se chillaayaa

" Saale Jab khud ko nahin sambhaal saktein... to itni peete kyon hai.."

My dad wrote this..
Ek chhote se kamre mein.... na jaane woh kaise rehtein hain....
itne saare khwaabon ke saath....
We should treat life , like we treat our luggage at Railway Station..
Keeping an eye on it always......holding it tightly.... trusting it only with those who are close...

Not like we treat lugguage at airports
Waiting for it.... watching at other's.. thinking its ours......
and cursing when we are the last one to find ours....



Thursday, November 10, 2011

Kya khareeda aapne..

aaj woh bete ko school chhodne phir ghar se niklaa....
thodi jaldi mein thha shyaad... helmet ghar par hi bhuul gaya...
kuch duur jaane par chowrahe par police waale ne haat dikhakar roka...
ussne jeb se Pacchaas rupey nikaale... aur police waale to thamaate hue aage nikal gaya...

bachha chhota thha... maasum thha..
jab school aaya to scooter se utar te hue.. puchha ...

"papa .. uss chouraahe pe kya kharidaa aapne ??"

Wednesday, November 9, 2011

Tazub hai zindagi kitni dur khhinch le gayi unhe...
Shehron mein rehne waale kheton mein photo khincha rahein hain....
Sote sote raat mein.... woh jaag jaataa hai aksar...
Khuda beti de garib ko... to darwaaza bhi de....
naam tera naa leta to kya kartaa...
mujhe apna kuch yaad thha kahaan..
insaa hun mein.... andheron mein kaise naa bikhar jaaun...
maine taaron ko bhi tuut te dekhaa hai aksar raaton mein....
Raat gehri si hai... Sannataa sa phir hone ko hai... aayeenge "sab ke sab" phir se..
Din mein Khuda jaane yeh "khayaal"... jaatein kahaan hai..
chalon yun kartein hain... ishq pe ilzaam laga detein hain...
phir tum apni raah... mein apni....
Jab akela sa hota hun raaton mein... to khud ko paata hun....
Bheed mey aksar mein kahin kho jaata hun....

Tuesday, November 8, 2011

apne bachhon ke liye mehngi dukaano mein khilone dhoodhte hain...
jo samandar ki reton se khelte thhey kabhi....
Khud ka pet bharne ke liye... ussne hawa tak bech daali ....
Gubbaron mein bhar kar...
raat ka kya hai kal phir aayegi....
aaj nindon ki baat suni jaay...
maine sambhaal ke rakhein hain kuch puraane khat or lifafe...
kal bacche yeh naa puch le ... Daakiyaa kaun thha....
jo sochtaa thha bol detaa thha.....
bachpan ki aadatein kuch theek hi thi..

Sunday, November 6, 2011

bachpan mein kahin... chhoooot gayaa thha peeche...
niklungaa ghar se... phir aaj.. itwaar dhoondne ko....
maa ke dibbae ka mazhab hain hota....
school mein .. mein aur aslam.. saath hi khaate thhe...
maa puchti nahin tankhwa aai ki nahin...
woh ek rupiya na mile mujhe to sar pe ghar uthaa leti hai....
ghar naa jaaun kisi ke to ruuth jaatein hain...
gaaon mein ab bhi woh tehjeeb baaki hai....
Ramayan ki kitaabein khareedne lagi hain maaein baazaaron se....
Jabse bacche Ra.One dekh aayein hain cinemaon mein.....
kuud jaatein hain hawaaon mein parinde...
ghonslon mein seekhe... kaise udaan koi...
chhat pe jaa kar.... woh maangta hai muraadein tut te taaron se....
bhuul jataa hai ki ... khule aasmaa ke niche bhi... sotein hain kai...
bachpan mein kahin... chhut gayaa thha peechee...
niklungaa ghar se... phir aaj.. itwaar dhoondne ko...

Saturday, November 5, 2011

woh puchte nahin uss se.... ke ghar kab lautega...
bacche ab deevar pe tange calendar ki... chuttiyaan gin letein hai....
tumse kya shikayat karun ke tum badal gaye ho...
haalaat yeh hai ki. hume khud ki khabar nahin...

Ye baadal insano se nazar aa rahein hain...
kudh to badal rahein hain pal pal mein..
Mujhe yaad gar jo hota.. tera naam kyon na leta..
Mera sawal yeh hai ki skaksh hun main kaun...
tujhpar ilzaam lagaata...to badnaam khud hota....
mehfion mein hain jaantey... mere naam se tujhe....

Friday, November 4, 2011

woh kuch likh raha thha gaadi ke dhuul bhare sheeshe pe apni choti choti unglion se......
mein ab tak yeh sochta thaa ..... ke shayar akelaa hun main.....
inn haaton ki lakiron se waqif nahin hun main.......
yeh woh shair hain khuda ke........ jinhe padh na paaya main .......
Fir ikkatthe hue hain kisi kone mein raqeebon (dushmano) ki tarah......
Yeh labz kambkhat dil se zubaan tak pahunchein to sahi.....
office ki mez(table) aur kursiyon se din bhar bahut pyaar kiya .....
raat mein to kuch ghar se wafaaein ki jaay..

Thursday, November 3, 2011

Maine orkut pe bahut doondha usse.. par wahan se wo kab ka ja chuka tha...
facebook pe bhi gaya main... logon ne kaha.... jyada dikhtaa nahin aajkal..
twitter pe bhi kai dino se khaamosh tha woh....
pehle ruth tey thhey to ghar chhod kar jaate thhe...
naa jaane log ruthkar kya kya chhod jatein hain aaj....
ussne subah subah khaali scooter der tak hilaayaa....
bacche samajdaar thhe..... school paidal nikal gaye....
main dhuuon se fark kartaa hun... gharon mein...
kahin chilam... kahin chulhe.... kahin khwaab.... kahin insaan jal rahein hain..
Siyaasaton ki aag mein bujh gayein kai chulhe......
Zaruraton ki baarish mein... kai khwaab jal gaye...

Wednesday, November 2, 2011

Raat ke panchi.. phir udein hain..... Alfaazon ka danaa chugne.....
Ghonsla kahin afsaano ka... ban ne ko hai..
Daftaron mein kahin Qaid hain... Zindagi ki roohein...
Isse sadko pe... Kheto mein.... Taaron ki chhat ke neechee le jaao ... yaaron...
Log sochte rahe..... Saansein ab bhi baaki hai......
Katl bhi kiyaa ussne to ... Hasta Chhoda mujhe....
Subah ka sooraj.. ab kuch garm sa hone laga hai.... chiddiyon ki aawaaz bhi dhundhli si hone lagi hai...
Khwaab koi raat ka .... puraa hone ko hai...

Tuesday, November 1, 2011

Kuch phate puraane mailay se note.... woh mutthi mein dabay chala jaa raha thaa....
Daulaton to apnii chupaa raha thaa....
Bas kitaabein hi nahi thhi school ke bastey mein .....
Daatein thhi kuch maa ki.... mor ka ek pankh thha...
Puraane kagaz ke kuch khilone bhhi thhe...

Woh jab gaya , garm chaadrein chhod gaya thha yaadon ki...
Takiye de gaya thha sapno ke...

Na jaane phir bhi kyon..... Neend naa aayi.. raat bhar.....
yaad nahin ... gum kyaa thaa... kuch to thaa...
kuch kaha to thha usne.... par dohraayaa nahin thaa....
deevar pe lage calendar ka... aaj palat gayaa panna....
naya mahina paidaa hua hai .... nayi zaruratein.. phir saans lengi.....
Mud ke zamane ki taraf dekha na thha usne.....Woh jab aaya thaa paas mere .....
Woh gaya to apni harkat phir dohra gaya mujh par.....