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Thursday, November 17, 2011

लाल मारुती ...

बहुत गुस्से वाला था वह ... पिताजी हमेशा समझाते रहते की.. बेटा इतना गुस्सा ठीक नहीं हैं .. थोडा दीमाग ठंडा रखा कर.. काफी दिनों से वह मोटर साइकिल की जिद कर रहा था .. पिताजी एक मामूली सी ऑफिस में क्लेर्क की नौकरी करते थे... इसलिए थोडा मुश्किल था.. वह रोज़ आकर पिता से बहस करता.. पिताजी की तबियत ठीक नहीं रहती थी इसलिए ज्यादा नहीं बोल पाते थे..

फिर एक दिन वह शाम को कॉलेज से घर लौटा, कोई दोस्त उससे अपनी मोटर साइकिल पर घर तक छोड़ने आया था. "देखा पिताजी... मेरे हर एक दोस्त के पास मोटर साइकिल है" आज बहुत गुस्से में था वह . खाना भी नहीं खाया..... माँ ने बहुत पूछा, पर किसी की कहाँ सुनने वाला था वह... बहुत गुस्सेवाला था.

देर शाम.. माँ ने चुपके से पिताजी के पास आकर कहा, " कब तक टालते रहोगे ?" कितने महीनों से जिद कर रहा है , ला दो ना इसे मोटर साइकिल" .

पिता ने कुछ कहा नहीं , बस मुड कर एक बार माँ की आँखों में देखा , बस फिर आगे कुछ बात नहीं हुई. कुछ बातें शायद कहीं नहीं जाती सिर्फ समझ ली जाती हैं ..

पिता रात भर सोचते सोचते सो गया , रोज़ की तरह फिर सीने में हल्का हल्का दर्द था.

अगले दिन ऑफिस जाकर उसने लोन के बारे पता किया , पत्नी की आँखों में उसने बहुत कुछ देखा था कल. शाम तक लोन के कागज़ भर दिए, अगले दिन उससे पुरे लोन के पैसे मिलने वाले थे.

वह शाम को घर पहुंचा , पत्नी को बताया की इंतज़ाम हो गया है लोन का... और कल वोह मोटर साइकिल ले आएगा . बेटा घर आया , आज भी गुस्से में था , खाना जल्दी खा कर सो गया था.

पत्नी कुछ घबराई हुई आज , पिता ने ठीक से खाना नहीं खाया था आज, "लोन में तकलीफ तो नहीं होगी ना". पिता ने करवट बदली और पीठ पत्नी की तरफ करते हुए कहा " नहीं , कोई तकलीफ नहीं होगी ". फिर कोई बात नहीं हुई.....

अगले दिन शाम को मोटर साइकिल घर पर थी, माँ दुप्पटे से सीट पोंछती हुई मोटर साइकिल को निहार रही थी... शाम होने वाली थी, बस बेटा घर पहुँचता ही होगा.. पिता के चेहरे पर कुछ भाव नहीं थे. .. आज कुछ ठीक नहीं लग रहा था उसे .. वह खुर्सी पर बैठा हुआ था.. शांत था .. बेटा घर लौटा , और मोटर साइकिल देखते ही ख़ुशी से पागल हो गया .. ना पिता की तरफ देखा ना माँ की तरफ.. सीधा मोटर साइकिल पर बैठ गया.. "अभी पप्पू को दिखा कर आता हूँ ... " उसने मोटर साइकिल शुरू की और घर से बहार निकल गया " ..

माँ बाप अब तक एक दुसरे का देख रहे थे.. माँ ने हल्की सी मुस्कराहट के साथ कहा "बहुत खुश है .."

वह मोटर साइकिल को तेज़ी से चलाता हुआ घर से काफी दूर निकल चूका था... तभी सामने से एक लाल रंग की मारुती वेन उससे टकराते टकराते बची... उस से कुछ दूर ही ब्रेक लगा कर रुकी.. उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया , उसने गाडी साइड में लगाई और सीधा उस मारुती वेन के ड्राईवर का गिरेबान पकड़ कर बाहर निकाला .. बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता था उसे..

जब तक पूरा गुस्सा नहीं उतरा उसने उस लाल मारुती के ड्राईवर को छोड़ा नहीं , करीब आधे घंटे की गाली गलोच और हाथापाई के बाद ही थोड़ी शान्ति हुई.. और फिर वह पप्पू के घर की और निकल गया..

शाम को जब वापस लौटा तो देखा की घर पर बहुत भीड़ लगी थी.. वो समझ नहीं पाया की हुआ क्या है... घर के बहार ही मोटर साइकिल लगाई और घर में चला गया.. पिताजी दम तोड़ चुके थे.... माँ कहीं नज़र नहीं आ रहीं थी... औरतों ने उन्हें घेर रखा था...

किसी ने उससे बताया की .. दिल का दौरा पड़ा था पिताजी को... किसी ने शहर से गाडी भी मंगाई थी फ़ोन कर के....पर गाडी पहुँचने से पहले ही... .. पिताजी दम तोड़ चुके थे....

लाल रंग की मारुती वेन थी.... समय पर नहीं पहुंची...

वह आजकल शांत शांत ही रहता है... मोटर साइकिल भी अक्सर घर पर ही खडी रहती है.....


2 comments:

Alok ki Duniya said...

वाह! हिंदी में पोस्ट देखकर अच्छा लगा / सिर्फ भाषा ही नहीं अपितु शैली और कथा ,और हमेशा की तरह कथा-सार भी अद्भुत है/

shailendra singh said...

Sir, its very touching...but again sad ending... pls write some happy ending story..