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Saturday, December 1, 2018

360 सेकंड ...

कार की चाबी घुमाने से पहले शीशे में देखा, सुमन मुँह फुला  कर पीछे बैठी थी । 

"अब खुश" ?

ऑफिस की पार्टी थी, और वह कांजीवरम पहनना चाहती थी, मेरे बड़े समझाने के बाद जीन्स पर राज़ी हुई थी।

"कुछ ही घंटों की बात है सुमन प्लीज्, साड़ी अजीब लगेगी" 

"मैंने कहां कुछ कहा" ?

मैंने चाबी घुमा दी और ऐसी का पंखा 4 पर कर दिया, वो अब भी गुस्से से बाहर देख रही थी।

"अच्छा बाबा सॉरी, जाओ बदल लो"

"ल" पर "ओ" की मात्रा लगने तक वो दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर के जा चुकी थी।

कुछ देर बाद हम सिग्नल पर थे, 

"360 सेकंड का भी कोई सिग्नल होता है" ?

उसका गुस्सा अब भी उतरा नहीं था, वो आगे की सीट पर बैठने को तैयार नहीं थी। मैं मेमसाब का ड्राइवर लग रहा था पर कांजीवरम में वो बहुत सुंदर लग रही थी।

सिग्नल के बगल में फुटपाथ पर एक 8-10 साल की बच्ची, एक साल के बच्चे के साथ खेल रही थी, शायद भाई था। उनकी माँ कुछ ही दूर गाड़ियों के शीशे ठकठाकाती पंखे बेच रही थी। जैसे ही उस लड़की ने हमारी गाड़ी देखी, वह दौड़ती हुई आई और पीछे का शीशा ठकठकानेलगी, उसके मैले हाथों ने शीशा गंदा कर दिया। सुमन वैसे ही गुस्से में थी, उसने उसे हाथ से जाने का इशारा किया,पर वो फिर भी ठकठाकाती रही।
"आज इसकी ख़ैर नहीं"

सुमन ने शीशा नीचे किया और ज़ोर से चिल्लाई।

"ऐ पागल लड़की चल भाग यहाँ से" !!!

आवाज़ इतनी ऊँची थी कि वो लड़की सहम गई और तुरंत भाग कर वापस अपने भाई के बगल में बैठ गयी, अब वह खेल नहीं रही थी।

150 सेकंड

मैं उस लड़की की ओर देख रहा था, शीशे में देखा तो सुमन भी। वह लड़की टकटकी लगाए सुमन की ओर वापस देखे जा रही थी।

"सुनो, उसे बुलाओ और कुछ दे दो"
सुमन ने धीरे से कहा, उसे अपनी गलती का एहसास हो गया था।

मैंने टोल टैक्स कि रसीदों के बीच में से एक दस का नोट निकाल कर सुमन की ओर बढ़ा दिया।

"तुम ही दे दो, सही रहेगा"

सुमन ने दस का नोट हाथ में लिया, कर का शीशा नीचे किया, 

"सुनो, इधर आओ"

30 सेकंड 

वो लड़की दौड़ते हुए आई, सुमन ने मस्कुराते हुए कहा

"ये लो, पर ऐसे किसी की गाड़ी का काँच गंदा नहीं करते, ठीक है" ?

15 सेकंड

"नहीं नहीं दीदी, पैसे नहीं चाहिए"

"वो आपकी साड़ी दरवाज़े के बाहर थोड़ी रह गई है, सड़क पर गंदी हो रही है"
उसने अपनी उँगली से नीचे की ओर इशारा करते हुए कहा।

सिग्नल हरा हो चुका था, पीछे वाली गाड़ी ने ज़ोर से हॉर्न बजाना शुरू कर दिया।
मैंने पीछे देखा, वो लड़की और सुमन दोनों एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे।

हॉर्न दुबारा बजा, इस बार ज़्यादा देर तक, लड़की वापस अपने भाई के पास भाग गई। मैंने भी गाड़ी आगे बढ़ा दी, दरवाज़ा खुल कर बंद होने की आवाज़ आई, सुमन ने साड़ी अंदर ले ली थी। करीब 20 मिनट का रास्ता बचा था ,वो शून्य में कार के बाहर देख रही थी, शीशा अब भी खुला था, सारे रास्ते हम चुप रहे। हवा से उसके बाल उड़ रहे  थे,पर उसे शायद एहसास ही नहीं था की शीशा खुला रह गया है। पहुँचने के बाद मैंने दरवाज़ा खोला,

"सलाम मेमसाब" !!

मैंने माहौल हल्का करने की कोशिश की,  पर उसने कोई जवाब नहीं दिया।

"सॉरी , बहुत सुंदर लग रही हो, मुझे ज़िद नहीं करनी चाहिए थी"।

उसके चेहरे पर अब गुस्सा नहीं था, पर कुछ और भी नहीं था।

उसने अपना पल्लू ठीक किया...

वो दस का नोट, वो दस का नोट अब भी उसकी मुट्ठी में सिकुड़ा हुआ पड़ा था।



Pic from: 
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5 comments:

Ashutosh Mishra said...

उम्दा, बेहतरीन, और क्या कह सकते है?

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की २२५० वीं बुलेटिन ... तो पढ़ना न भूलें ...


यादगार मुलाक़ातें - 2250 वीं ब्लॉग बुलेटिन " , में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Unknown said...

Ektarfa.....

रश्मि प्रभा... said...

https://bulletinofblog.blogspot.com/2018/12/2018-19.html?m=1

Unknown said...

बेहतरीन... दिल को छू गई।