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Wednesday, September 12, 2012

पर अब पहले जैसा कहाँ रहा......


जाने क्या देख रहा थाकुछ तो देख रहा था. गर्दन थोड़ी सी नीचे की और झुकी हुईऔर आखें जैसे झपकना ही भूल गयीं हो. सामने वाले फूटपाथ पर चलते हर कदम पर उसकी नज़र थी. ऐसा लगता होजैसे बस यही काम था उसका.


जाने कितने सालों से वो रोज़ उसी पेड़ के नीचे बैठताएक खूँटी सी गढ़ी थी ज़मीन मेंऔर जूतों के कुछ पुराने फीतों से एक टूटी सी छत्रीउस खूंटे से बंधी थी लोहे की एक तिकुने सी चीज़ उसके सामने पड़ी रहती  जिस पर हमेशा एक पुराना जूता औंधे मुह लेटा हुआ होता.

मोटे चश्मे पहने वो बूढा अब तक गर्दन झुकाएउन क़दमों की तरफ ही देख रहा था. चश्मा इतना मोटा था की उसके पीछे की वो कमज़ोर आखें तक नहीं नज़र आ रहीं थी, और उन आखों को भी शायद ही कुछ कम ही दिखाई दे रहा होगा चश्में के उस पार. 

वो उसी जगह बैठे लोगों के जूते , चप्पलें सीता था, पर अब पहले जैसा कहाँ रहा, पहले लोग चप्पलों में सेफ्टी पिन लगाये उस तक पहुँच जाते थे. अब तो वैसा भी नहीं रहा,  जाने सुबह से शाम तक वहाँ बैठे बैठे कितना कमा लेता होगा.

पहले तो हाथ उस  मोटे सुए में फंसे सफ़ेद धागे को बड़ी तेजी से चमड़ों के आर पार करते थे, और धागे का जो सिरा बाहर की तरफ बच जाता, बड़ी सफाई से उसे काट दिया जाता. मैंने भी कई दफे अपने घिसे हुए स्कूल के काले जूतों में  रबर की मोती परतें लगवाई थी उससे, पर आजकल कोई नहीं आता उसके पास, मुझे भी कुछ शर्म सी आती है अपने बच्चों के फटे जूते वहाँ खड़े खड़े उससे सिलवाने में और बच्चों को उन सिले हुए जूतों को पहनने में शायद ज्यादा शर्म आये.

कोई नहीं आता आज कल.

अगर कोई आकर उसके सामने रुक जाता तो पहले वो बूढ़ीं आखें खूब उन जूतों को देखती,  फिर वो गरदन उठा कर चेहरे की तरफ देखते हुए कहता  "बोलिए भाई साहब... सी दूँ.... "

मैं अब तक ये नहीं समझ पाया की वो रोज़ यहाँ आता क्यों है, चप्पलें जूतें कौन ठीक कराता है आज कल, समय कहाँ है किसी के पास. लोग तेज़ पैरों को नहीं संभाल पाते, तो फिर चप्पलों और जूतों .............खैर छोड़ों जाने दो... 
पर मैं आज भी उसे वहीँ बैठा देखता हूँ, मोटे चश्मे के पीछे से, उन क़दमों को घूरते हुए.... 

और आज भी जब वो आता है.... नंगे पाँव ही आता है......


Photo From: http://www.flickr.com/photos/baggaz/4307347966/in/photostream/

4 comments:

AbidZaidi1 said...

...kahiin kuch bhi nahiin badla...bas hamara sochne ka andaz badal gaya hai...pehle Rs20/- ki chappal theek hoti thi, ab Rs.2000/- ka joota repair hota hai...
waise....bahot achcha likha #mbaria....

प्रतीक माहेश्वरी said...

दर्द उभर रहा है.. तेज़ी से दौड़ती ज़िन्दगी में दिखावा ही सब कुछ हो गया है.. गंभीर, विचारणीय कृति..

S Kumar Parmar said...

This so called modernization is crushing many traditional trades, ruining d poor and swelling the coffers of new rich people...People are making slogan that India is shining and I always ask from which side....It seems the real stories of many....!!!

...Radha said...

shabd nahin hain ab.